Wednesday, November 23, 2016

वो मगरमच्छ भी अब शर्माते हैं

वो मगरमच्छ भी अब शर्माते हैं

भूख को धैर्य रखना समझाते हैं, बात उनकी निराली है, 
आँखों को समझो समुन्दर, और आंसुओं का खारा पानी बताते हैं,

बात करो आज की, तो हजार साल पीछे जाते हैं,
धन्य है वो पाठशाला और गुरु, जहां आँखों वालों को अंधा बनाते हैं,

पंडित-पुरोहित, शादीशुदा-गैरशादीशुदा, बीच में रिक्त स्थान,
उन्हें खुद नहीं मालूम, वो जताना क्या चहाते हैं,

चापलूसी प्रिय है राजा को, भीड़ खड़ी की है चापलूसों की,
तर्क संगत बात करने वालों को, चापलूस देश-द्रोही ठहराते हैं,

बात-बात में नीचे मुंह कर सुबकियां लेना, राजा का शगल अनोखा है,
ऐसे टसुए देख, बचपन में खेला जिनसे, वो मगरमच्छ भी अब शर्माते हैं,

अरुण कान्त शुक्ला
24/11/2016

          

Saturday, November 19, 2016

रोटी अब चाँद हो गयी है

रोटी अब चाँद हो गयी है

न मेरा कोई पक्षकार है 
न मेरा कोई पक्ष है 
रिरियाती जनता है 
मिमयाता विपक्ष है ।

औंधे मुहं पड़ा सुखों का संसार है 
उसके ऊपर ठहाके लगाता दुखों का पहाड़ है 
मरी हुई संवेदनाओं के बीच 
मनुष्य भी बना भक्ष्य है ।।

राजा के चारणों के बीच 
बुद्धि बेआवाज है 
 
झूठों के नक्कारों की गूंज के बीच 
 
सत्य बना तूती की आवाज है।।।

चाँद अब रोटी सा नहीं दिखता 
रोटी अब चाँद हो गयी है 
रोज नहीं जलते दिवाली के दिए
पर, रात रोज अब अमावस हो गई है।।।।

राजा अंधा, दरबारी अंधे, संतरी बहरे 
सब करते सिर्फ 'मन की बात'
उनके बीच, न मेरा कोई पक्ष है 
न मेरा कोई पक्षकार है।।।।।

अरुण कान्त शुक्ला 
20
नवम्बर
,2016

Monday, November 7, 2016

जिस दिन आपका खाता भर जाएगा

जिस दिन आपका खाता भर जाएगा 

ईन्साफ अब कुछ इस कदर जल्द मिलने लगा है, 

अदालत काजी मुंसिफ की जरुरत न रही, 

सजा-ऐ-मौत भी अब सड़क पर तुरंत मिलने लगी है,

सवाल न पूछिए अब, 

सवाल पूछने से पहले ही हर सवाल का जबाब मिलने लगा है, 

शिकायत न करिये, 

कोई है जो आपकी शिकायतों का खाता लिखने में लगा है, 

सब्र रखिये जिस दिन आपका खाता भर जाएगा, 

वो खुद .65 लेकर आपको निपटाने आपके घर आ जायेगा,

अरुण कान्त शुक्ला
6/11/2016  

Friday, July 15, 2016

आदमी, कारवाँ और आदमियत


अकेले चलकर नहीं पहुंचा है,
आदमी आदमियत तक,
आदमी आज जहां है,
कारवाँ में ही चलकर पहुँचा है,
भीड़ से मंजिल का कोई वास्ता नहीं दोस्त,
भीड़ तो हत्याएं करती है,
कारवाँ मंजिल तय करता है,
भीड़ का हिस्सा जब आदमी था,
आदमी कहां वो तो आदम था,
भीड़ में आज भी आदम हैं,
आदमियों का कारवां तो धीरे धीरे सही,
बढ़ रहा है मंजिल की ओर,

6/02/2016

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने


झरने पत्थरों से नहीं
पहाड़ों के दिल से निकलते हैं
कभी देखिये खुद को पहाड़ बनाकर
आंसुओं के झरने फूटेंगे दिल में सुराख बनाकर

दर्द से दिल का रिश्ता
बाती और मोम सा है
किसी के दर्द से पिघले नहीं
वो दिल कैसा है ?

पहाड़ से झरने नीचे झरते हैं
आँख से आंसू नीचे ढलकते हैं
ये बात तेरी मेरी नहीं, उनकी है
जो दिल की जगह पत्थर रखते हैं
4/2/2016 

Thursday, July 14, 2016

मनुष्यता जहां खो जाती है..

शब्द जहां थोथे पड़ जाते हैं, 
संवेदना जहां मर जाती है, 
उस मोड़ पर आकर खड़े हो गए हम, 
मनुष्यता जहां खो जाती है,

दर्द बयां करने से क्या होगा यहाँ, 
मुरदों की ये बस्ती है, 
लाशें बिकती हैं महंगी यहाँ, 
जिन्दों की जाने सस्ती हैं,

इंसान रेंगता यहाँ, 
दो हाथों पैरों पर, 
सियार भेड़िये चलते दो पांवों पर, 
अजब ये बस्ती है,


सांस लेने को अगर कहते हो ज़िंदा रहना, 
तो हम ज़िंदा हैं, 
पर, नहीं हमारी कोई हस्ती है,
सोच में जिनकी बसा शौचालय, 
उन्हीं की आज हस्ती है

जो ज़िंदा हैं वो बोलेंगे, 
जो बोलेंगे वो मरेंगे, 
जिंदा रहने की शर्त यहाँ चुप रहना है,
है ये रीत अजब, 
पर, यही रीत आज चलती है,


अरुण कान्त शुक्ला
14/7/2016

Tuesday, January 12, 2016

‘अकेलेपन’ का अहसास


टूट रही थी सांस 'मेरी' और जुबां सूखी थी,
तुझे नहीं पुकारा था, 'चंद बूँद' पानी की जरुरत थी ||

तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, 
मेरे लबों को नहीं, मेरे सर को तेरी गोदी की जरुरत थी,

इश्क में तू करता रहा वादे पे वादे ,
मुझे तेरे वादों की नहीं, तेरी वफ़ा की जरूरत थी,

तेरे नाले मुझसे थे तेरा माशूक था कोई और,
तुझसे इश्क मेरी गलती थी, तुझसे नफ़रत उस वक्तकी जरुरत थी,

क़यामत के रोज पूछियेगा अख़लाक़ से अकेलेपनका अहसास,
हम प्यालों, हम निवालों के बीच अकेला, जब किसी 'अपने' की उसे शिद्दत से जरुरत थी,

11/01/2016