Friday, May 26, 2017

खुशी

खुशी

जख्म परायों ने दिए, 
मैं मुस्कराता रहा, 
जख्म तुमने दिए, 
मैं हँस दिया,

बेवफाई के दौर से गुजरते हैं सभी, 
मैं भी गुजरा,
बेवफाई जब तुमने की,
मैं हंस दिया,

गुम्बद मीनार पर चढ़कर,
इतराने लगा,
तब नींव का पत्थर,
उसके गुरुर पर हंस दिया,


मुश्किलें बहुत आईं जिन्दगी में,
मुस्करा कर झेल गया,
पर, जब मुश्किल तुमने पैदा की,
नादानी पर तुम्हारी हंस दिया,

अरुण कान्त शुक्ला
26/5/2017      



Tuesday, April 4, 2017

तपिश

तपिश

ये तपिश
सिर्फ सूर्य की तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई घाम में आग घोल रहा है,

ये थकान
सिर्फ चलने की तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई पाँव में पत्थर बाँध कर चला रहा है,

ये दुश्मनी
सिर्फ मेरी तेरी तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई मेरे-तेरे बीच दुश्मनी करा रहा है,

मेरे आँगन के पत्थर
पहले भी गर्म होते थे
उन पर चलने से तलुए चिलकते थे,
पर अब गर्म कहाँ होते हैं जलाते हैं
यूँ लगता है
जैसे कोई उनमें आग लगा रहा है,

मेरे घर के झरोखे से
पहले भी गर्म हवाएं अन्दर आती थीं
पर, वो सुकून देती थीं,
अब तो लपटें आती हैं
हम डरते हैं झरोखे खोलने से
यूँ लगता है कोई झरोखे से अग्निबाण चला रहा है,

कौन है वो?

अरुण कान्त शुक्ला

4अप्रैल, 2017      

Tuesday, January 3, 2017

और कारवां...

और कारवां

न वाह वाह का शोर
न तालियों की गडगडाहट
न मित्रों की पीठ पीछे दी गईं गालियाँ
न भीड़ में पारित निंदा प्रस्ताव
कोई भी तो मुझे डिगा नहीं सका
मेरे चेहरे पर न एक दाग लगा सका
सबसे बेखबर बेपरवाह
आज भी मैं बढ़ रहा हूँ मंजिल-ऐ-ज़ानिब की ओर
कारवां के साथ
और कारवां
वह तो बनता गया
मंजिल की तरफ बढ़ते
मेरे हर कदम के साथ

9/2/2016  

सदियों बाद की पीढी भी ...

सदियों बाद की पीढ़ी भी

एक दिन होगा राज हमारा |2|
हिसाब तुम्हारा किया जाएगा |2|
छांट छांट कर |2|
छांट छांट कर एक एक गुनाह की,
सज़ा मुकर्रर की जायेगी|2|
जब होगी मौत तुम्हें|2|
जब होगी मौत तुम्हें धरती के,
इतने नीचे दफ़न किया जाएगा|2|
सदियों बाद की पीढ़ी को|2|
सदियों बाद की पीढ़ी को जब,
मिलेंगी हड्डियां तुम्हारी,
जब मिलेंगी हड्डियां तुम्हारी,   
वे भी गायेंगी उन्हें देखकर|2|
हर जुल्मी की|2|
हर युग में,
गत ऐसी ही की जाएगी|2|
सदियों बाद की पीढ़ी भी|2|
आज के विजय गीत गायेगी|2|
एक दिन होगा राज हमारा|2|
हिसाब तुम्हारा किया जाएगा|2|   

अरुण कान्त शुक्ला

1/1/2017  

Monday, December 19, 2016

घुप्प, शुभ्र घना कोहरा

घुप्प, शुभ्र घना कोहरा


घुप्प, कारी अमावस की रात के अँधेरे को
परास्त कर देता है
एक छोटे से टिमटिमाते दिए का प्रकाश
पर घुप्प, शुभ्र घने कोहरे को
कहाँ भेद पाता है अग्नि पिंड सूर्य का प्रकाश

प्रकाश का अँधेरे को परास्त करना है
अज्ञान पर ज्ञान की जीत
पर, कोहरे को परास्त नहीं कर पाता प्रकाश
क्योंकि, कोहरा अज्ञान नहीं
ज्ञान पर पड़ा अंधेरा है

तलाशते रहेंगे अनवरत अनंत काल तक
अपनों के बीच अपनी जमीन
सबके साथ
जब तक छाया रहेगा मानव के मष्तिष्क में
ईश्वर और धर्म के भय का गहरा कोहरा 
जिसे फैलाते हैं 
उसी अस्तित्वहीन ईश्वर के धर्मी दूत 


समय आ गया है, पहचाने उन्हें
फैला रहे हैं जो ज्ञान पर
घुप्प, शुभ्र घना कोहरा
समय रहते यदि रोका न इनको
धिक्कारेंगी आने वाली पीढ़ियाँ
सदियों तक हमको

अरुण कान्त शुक्ला 
 12/02/2016 

Saturday, December 17, 2016

भला 'मौन'

भला ‘मौन’

मौन भला होता है,
अनेक बार,
‘बकवास’ बोलते रहने से,
तुम्हारा मौन इसीलिये भला लगा मुझे,
इस बार,
बचा तो मैं एक और,
बकवास सुनने से,

कितना अच्छा होता,
तुम्हारे मुंह से निकले शब्दों के,
अर्थ भी कुछ होते,
कथनी और करनी में,
रिश्ते भी कुछ होते,
बच जाते दबे-कुचले,
तुम्हारी ‘सनक’ के नीचे पिसने से,

लोकतंत्र में ‘लोक’ से न रहा,
कभी तुम्हारा रिश्ता,
‘तंत्र’ रहा हमेशा,
तुम्हारे शासन में सिसकता,
इतिहास में दर्ज तो प्रत्येक शासक होता है,
पर, तुम्हारा ‘काल’ तो लिखा जाएगा,
स्याह स्याही के हर्फों से,        

अरुण कान्त शुक्ला

16/12/2016    

Thursday, December 15, 2016

दौर कहाँ बदला है मित्र ?

दौर कहाँ बदला है मित्र?

न रूस, न चायना में हो रही अब बारिश है, 
न भारत में खोलता कोई छाता है, 
न किसी को मास्को की ठंड से छींक आती है, 
फर्क यही है हमारी आलोचना की सच्चाई, 
अब उन्हें बहुत डराती है, 
अपने गलतको सहीबताने,
हमें साम्यवादी बताने की,
ये उनकी पुरानी साजिश है,

अमरीका,ब्रिटेन के तलुए चाटने वाले,
जब से आए हैं सत्ता में, 
देश नहीं तब से,
मनमोहन, मोदी के निर्देशों पर, 
विश्व व्यापार संगठन , विश्व बैंक और आईएमएफ 
के निर्देशों पर चलता है,
राष्ट्रप्रेम, देशप्रेम के जुमले उनके,
सिर्फ हमें बहलाने की साजिश है,

दौर कहाँ बदला है मित्र?
ये राजा भी,
देश की धरती, खनिज, जंगल बेचने,
विदेश में फेरी लगाने जाता है, 
 
गिडगिडाते रोज विदेशी कंपनियों के सामने, 
'
मेक इन इंडिया' का कहाँ 'इंडिया' से कोई नाता है? 
नोटबंदी नहीं कालेधन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद के खिलाफ,
गरीबों के जायज धन को लूटने रची साजिश है,

हमें सिखाये भारत का रास्ता, 
युद्ध से बुद्ध को जाता है,
सिद्धार्थ नहीं बना बुद्ध,
युद्ध से, 
 
बुद्ध ने न की कभी की बात युद्ध की,
अशोक आज भी इतिहास में नृशंस हत्यारा कहलाता है, 
अपना की इतिहास भुलाने के लिए राजा ने,
बुद्ध से जुड़ने की रची ये साजिश है,

साम्यवाद तो कभी आया न विश्व में, 
समाजवाद से भारत का रहा नहीं दूर का नाता, 
पर, इनकी बुराई पर ही कुछ लोगों का जीवन है पलता, 
तेरहीं खाकर जीने वाले गमछा धारी को, 
भला घर का भोजन है कब रुचता?
हमें भला कहाँ उज़्र साम्यवादी कहलाने में,
पर, समझना जरूरी है कि क्या उनकी साजिश है?

अरुण कान्त शुक्ला,
14/12/2016