Monday, November 7, 2016

जिस दिन आपका खाता भर जाएगा

जिस दिन आपका खाता भर जाएगा 

ईन्साफ अब कुछ इस कदर जल्द मिलने लगा है, 

अदालत काजी मुंसिफ की जरुरत न रही, 

सजा-ऐ-मौत भी अब सड़क पर तुरंत मिलने लगी है,

सवाल न पूछिए अब, 

सवाल पूछने से पहले ही हर सवाल का जबाब मिलने लगा है, 

शिकायत न करिये, 

कोई है जो आपकी शिकायतों का खाता लिखने में लगा है, 

सब्र रखिये जिस दिन आपका खाता भर जाएगा, 

वो खुद .65 लेकर आपको निपटाने आपके घर आ जायेगा,

अरुण कान्त शुक्ला
6/11/2016  

Friday, July 15, 2016

आदमी, कारवाँ और आदमियत


अकेले चलकर नहीं पहुंचा है,
आदमी आदमियत तक,
आदमी आज जहां है,
कारवाँ में ही चलकर पहुँचा है,
भीड़ से मंजिल का कोई वास्ता नहीं दोस्त,
भीड़ तो हत्याएं करती है,
कारवाँ मंजिल तय करता है,
भीड़ का हिस्सा जब आदमी था,
आदमी कहां वो तो आदम था,
भीड़ में आज भी आदम हैं,
आदमियों का कारवां तो धीरे धीरे सही,
बढ़ रहा है मंजिल की ओर,

6/02/2016

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने


झरने पत्थरों से नहीं
पहाड़ों के दिल से निकलते हैं
कभी देखिये खुद को पहाड़ बनाकर
आंसुओं के झरने फूटेंगे दिल में सुराख बनाकर

दर्द से दिल का रिश्ता
बाती और मोम सा है
किसी के दर्द से पिघले नहीं
वो दिल कैसा है ?

पहाड़ से झरने नीचे झरते हैं
आँख से आंसू नीचे ढलकते हैं
ये बात तेरी मेरी नहीं, उनकी है
जो दिल की जगह पत्थर रखते हैं
4/2/2016 

Thursday, July 14, 2016

मनुष्यता जहां खो जाती है..

शब्द जहां थोथे पड़ जाते हैं, 
संवेदना जहां मर जाती है, 
उस मोड़ पर आकर खड़े हो गए हम, 
मनुष्यता जहां खो जाती है,

दर्द बयां करने से क्या होगा यहाँ, 
मुरदों की ये बस्ती है, 
लाशें बिकती हैं महंगी यहाँ, 
जिन्दों की जाने सस्ती हैं,

इंसान रेंगता यहाँ, 
दो हाथों पैरों पर, 
सियार भेड़िये चलते दो पांवों पर, 
अजब ये बस्ती है,


सांस लेने को अगर कहते हो ज़िंदा रहना, 
तो हम ज़िंदा हैं, 
पर, नहीं हमारी कोई हस्ती है,
सोच में जिनकी बसा शौचालय, 
उन्हीं की आज हस्ती है

जो ज़िंदा हैं वो बोलेंगे, 
जो बोलेंगे वो मरेंगे, 
जिंदा रहने की शर्त यहाँ चुप रहना है,
है ये रीत अजब, 
पर, यही रीत आज चलती है,


अरुण कान्त शुक्ला
14/7/2016

Tuesday, January 12, 2016

‘अकेलेपन’ का अहसास


टूट रही थी सांस 'मेरी' और जुबां सूखी थी,
तुझे नहीं पुकारा था, 'चंद बूँद' पानी की जरुरत थी ||

तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, 
मेरे लबों को नहीं, मेरे सर को तेरी गोदी की जरुरत थी,

इश्क में तू करता रहा वादे पे वादे ,
मुझे तेरे वादों की नहीं, तेरी वफ़ा की जरूरत थी,

तेरे नाले मुझसे थे तेरा माशूक था कोई और,
तुझसे इश्क मेरी गलती थी, तुझसे नफ़रत उस वक्तकी जरुरत थी,

क़यामत के रोज पूछियेगा अख़लाक़ से अकेलेपनका अहसास,
हम प्यालों, हम निवालों के बीच अकेला, जब किसी 'अपने' की उसे शिद्दत से जरुरत थी,

11/01/2016  


Tuesday, September 8, 2015

मुझे सबसे है प्रीत..

पांच दोहे..

जग बदले, बदले जग की रीत,
मैं 'अरुण' क्यों बदलूं, मुझे सबसे है प्रीत,

रार रखना है तो सुनो मित्र, रखो खुद से रार,
छवि न बदले कभी किसी की, चाहे दर्पण तोड़ो सौ बार,

समझ बूझकर लो फैसले, समझ बूझकर करो बात,
गोली जैसी घाव करे, मुंह से निकली बात,

काग के सिर मुकुट रखे से, काग न होत होशियार,
उड़ उड़ बैठे मुंडेर पर, कांव कांव करे हर बार,

कहे ‘अरुण’ सीख उसे दीजिये, जो पाकर न बोराय,
करे चाकरी राजा की, सीख उसे कभी न भाय,


8 सितम्बर, 2015    

Sunday, September 6, 2015

मन की बात का बोझ..

मन की बात का बोझ

एक आदमी में छुपे हैं कई शैतान,
आखिर कोई शैतान का सम्मान करे तो क्यों करे?

एक आदमी के ज्ञान की परतों में छिपी हैं कई मूढ़ताएं
आखिर कोई किसी मूढ़ पर भरोसा करे तो क्यों करे?

एक आदमी के अतीत के पन्नों पर पुती है काली स्याही
आखिर कोई किसी के अतीत से आँखें मूंदे तो क्यों मूंदे?

एक आदमी की बातों में बस पकते हैं ख्याली पुलाव
आखिर कोई किसी के ख्याली पुलावों से पेट भरे तो कैसे भरे?

एक आदमी कर रहा है मन मन भर मन की बात  
आखिर कोई उसके मन की बात का बोझ ढोए तो क्यों ढोए?

अरुण कान्त शुक्ला

6/9/2015