Tuesday, January 12, 2016

‘अकेलेपन’ का अहसास


टूट रही थी सांस 'मेरी' और जुबां सूखी थी,
तुझे नहीं पुकारा था, 'चंद बूँद' पानी की जरुरत थी ||

तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, 
मेरे लबों को नहीं, मेरे सर को तेरी गोदी की जरुरत थी,

इश्क में तू करता रहा वादे पे वादे ,
मुझे तेरे वादों की नहीं, तेरी वफ़ा की जरूरत थी,

तेरे नाले मुझसे थे तेरा माशूक था कोई और,
तुझसे इश्क मेरी गलती थी, तुझसे नफ़रत उस वक्तकी जरुरत थी,

क़यामत के रोज पूछियेगा अख़लाक़ से अकेलेपनका अहसास,
हम प्यालों, हम निवालों के बीच अकेला, जब किसी 'अपने' की उसे शिद्दत से जरुरत थी,

11/01/2016  


Tuesday, September 8, 2015

मुझे सबसे है प्रीत..

पांच दोहे..

जग बदले, बदले जग की रीत,
मैं 'अरुण' क्यों बदलूं, मुझे सबसे है प्रीत,

रार रखना है तो सुनो मित्र, रखो खुद से रार,
छवि न बदले कभी किसी की, चाहे दर्पण तोड़ो सौ बार,

समझ बूझकर लो फैसले, समझ बूझकर करो बात,
गोली जैसी घाव करे, मुंह से निकली बात,

काग के सिर मुकुट रखे से, काग न होत होशियार,
उड़ उड़ बैठे मुंडेर पर, कांव कांव करे हर बार,

कहे ‘अरुण’ सीख उसे दीजिये, जो पाकर न बोराय,
करे चाकरी राजा की, सीख उसे कभी न भाय,


8 सितम्बर, 2015    

Sunday, September 6, 2015

मन की बात का बोझ..

मन की बात का बोझ

एक आदमी में छुपे हैं कई शैतान,
आखिर कोई शैतान का सम्मान करे तो क्यों करे?

एक आदमी के ज्ञान की परतों में छिपी हैं कई मूढ़ताएं
आखिर कोई किसी मूढ़ पर भरोसा करे तो क्यों करे?

एक आदमी के अतीत के पन्नों पर पुती है काली स्याही
आखिर कोई किसी के अतीत से आँखें मूंदे तो क्यों मूंदे?

एक आदमी की बातों में बस पकते हैं ख्याली पुलाव
आखिर कोई किसी के ख्याली पुलावों से पेट भरे तो कैसे भरे?

एक आदमी कर रहा है मन मन भर मन की बात  
आखिर कोई उसके मन की बात का बोझ ढोए तो क्यों ढोए?

अरुण कान्त शुक्ला

6/9/2015    

Friday, August 28, 2015

मित्र कवि युद्ध शिल्पी न बनो..



मित्र कवि युद्ध शिल्पी न बनो

कविता में तोप चलाओ,
पर बेरोजगारी के खिलाफ,
तलवारें भांजो पर भुखमरी के खिलाफ,
डंडे बरसाओ पर स्त्री की अस्मत के खातिर ,
भाई कवि मित्र,
पर अपनी कविता में,
युद्ध के लिए देशों को न उकसाओ ,
इसकी कीमत बहुत भारी होती है,
विधवाओं की सूनी मांग ,
समाज के लिए रात कारी होती है,
शब्द शिल्पी हो तुम,
युद्ध शिल्पी न बनो,
कविता को बनाओ,
नये सपनों,
नये समाज को गढ़ने का आधार,
जिसमें हो समानता, बराबरी और भाईचारा,
रहे यही प्रयास तुम्हारा,
बन न पाये कविता कभी,
किसी युद्ध का हथियार,
किसी सिरफिरे की वहशी सोच का औजार,
28/8/2015

Wednesday, August 19, 2015

मूर्खों को हमने सर बिठाकर रखा है,

मूर्खों को हमने सर बिठाकर रखा है

एक दिन किसी ने मुझसे पूछा
तलवार ज्यादा मार करेगी या फूल,
मैंने कहा, तलवार,
तो उसने कहा
फिर कविता में इतना
रस क्यूं,

सीधे कहो न कि मूर्खों को हमने सर बिठाकर रखा है,    

Thursday, July 23, 2015

बेवफा लहरें..



बेवफा लहरें

समुद्र की लहरें कभी खामोश नहीं रहतीं,
समुद्र की लहरें कभी वफ़ा नहीं करतीं,
उनकी फितरत है लौट जाना,
साहिल को भिगोकर,
लहरों पे कभी यकीन न करना
रेत पर पाँव जमा कर रखना,
वरना, बेवफा लहरें बहा ले जायेंगी,
तुम्हें भी, तलुए के नीचे की रेत के साथ,
समुद्र के किनारे खड़े होना भी जद्दोजहद है,
ठीक वैसी ही, जैसी रोज होती है मेरे साथ,
दो वक्त की रोटी कमाने के लिए,
चुकाने पड़ते हैं, कई वक्त की रोटियों के दाम, 

23/7/2015

Saturday, July 18, 2015

ये खुशबू कहाँ से आ रही है रोटी की हवाओं में



ये खुशबू कहाँ से आ रही है रोटी की हवाओं में


आता रहा जाता रहा तेरा चेहरा रात भर ख्यालों में

ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में ,



भूख से लरजते बच्चे ने पूछा माँ से, माँ,

ये खुशबू कहाँ से आ रही है रोटी की हवाओं में,



तेरे जुमले अब जुल्मों में बदल रहे हैं,

क्या हुआ उन वादों का किये थे जो चुनावों में,



लोग मर रहे हैं, तुम लाश गिन रहे हो,

मुश्किल हो गया है सांस लेना, सड़ांध इतनी है हवाओं में,



तुम्हारी सभाओं में बजती तालियों का राज खुल गया है,

खुद ले जाते हो ताली बजाने लोगों को सभाओं में,


18/7/2015