Monday, July 22, 2013

उन्हें अंगार ठंडे लग रहे हैं



उन्हें अंगार ठंडे लग रहे हैं




वो आग से इतनी दूर बैठे हैं,  
कि, आंच उन तक पहुँचती नहीं,  
उन्हें अंगार ठंडे लग रहे हैं,  
हमसे कहते हैं कि अंगारों से खेलो,  
क्यों, इसलिए कि वो दूर बैठे हैं  
कि , आंच उन तक पहुँचती नहीं,

Saturday, July 20, 2013

ये धरती मेरी है..

ये धरती मेरी है,
ये आसमां मेरा है,
तुम्हें नहीं दिखता जो समां ,
वो समां बहुत गहरा है,
तुम देखते रहो,
मुक्त करा लूंगा मैं दोनों को,
ये आज भी मेरा है,
वो कल भी मेरा है,


Thursday, June 13, 2013

मैं अरुण हूँ,



मैं अरुण हूँ,

 लाल हूँ,

 पर नहीं काल किसी का,

 आता धरा पर गगन से,

रोशन अंधियारे को करने ,

दिवस श्रम से थककर चूर,                                                                                   

 मानव जब जाता विश्रांति के आलिंगन में,

आजाद कर देता मैं ,

अंधियारे को चाँद से क्रीड़ा करने ,

 मैं अरुण हूँ,

लाल हूँ,

 काल नहीं मित्र सभी का ,

 आओ लगो ह्रदय मेरे,

 मैं हर लूंगा तिमिर,

 तुम्हारे भी भीतर का ,

Friday, April 19, 2013

मित्र विजय की स्मृति में ..



मित्र विजय की स्मृति में ..

ये किताब भी बड़ी अजीब है दोस्त,
जो बात किसी से कह नहीं सकते,
इसमें लिखी जाती है,
लिख दिया आज फिर इसमें,
ऐसा कुछ खास था तुम में,
की याद तुम्हारी नहीं जाती है,

वक्त के समुन्दर में,
तुम्हारे साथ बिताये लम्हें,
दिल के किनारों से टकराते रहते हैं,
जब गुमसुम होता हूँ ,
तो फौलाद से बाजू खड़े हो जाते हैं,
गुदगुदाते हैं, हंसाते हैं,
बहुत मुश्किल से तुमसे दोस्त बनते हैं,
की याद तुम्हारी नहीं जाती है,

अरुण कान्त शुक्ला
12 अप्रेल 2013

Monday, October 29, 2012

ठीक से शफल करो यार,




वो पांच हैं,
65
वर्ष से जुआं खेल रहे हैं,
तीन पत्ती,
उनमें से एक हर बार हारता है,
उसके पास हमेशा दो तीन पांच ही आता है,
उसने उनमें से एक से कहा,
ठीक से शफल करो यार,
तुम तीनों के पास हमेशा आते हैं तीन इक्के,
और मेरे पास दो तीन पांच,

मेरे बाप के पास भी ये ही आता था,
वो भी हारता था,
उसके बाप के पास,
और फिर उसके बाप के बाप के पास,
और फिर उसके बाप के बाप के पास भी,
दो तीन पांच ही आता था,
वो भी हारता था,
मैं भी हारता हूँ ,

ठीक से शफल करो यार,
उस एक ने फिर से शफल किया,
मुस्करा कर पत्ते बाँट दिये,
फिर उन तीनों के पास तीन इक्के थे,
और, उस चौथे के पास फिर,
दो तीन पांच था,

चौथा, पांचवे के पास गया,
बोला, आप तो न्यायप्रिय हो,
गड्डी में तो चार ही इक्के होते है,
फिर इन तीनों के पास बाकी कहाँ से आते हैं?
वो मुस्करा दिया,
अपने पास की गड्डी निकाली,
शफल किया और पत्ते बाँट दिये,
उन तीनों के पास फिर तीन इक्के थे,
चौथे के पास फिर दो तीन पांच थे,

बुझो वो तीनों कौन थे?
जिनके पास हमेशा तीन इक्के आते थे,
और वो पांचवा कौन है ?
जिसने पहली तीनों को तीन इक्के बांटे,
और वो चौथा कौन है?
पुरखों से जिसके हिस्से में दो तीन पांच ही आते हैं,
और गड्डी में कुल कितने पत्ते हैं?