Wednesday, June 7, 2017

तिनकों से बने सपने

तिनकों से बने सपने

तिनकों से बने सपने तो , 
हवा के हलके झोके से बिखर जाते हैं, 
आंधी तो आती है आशियाने उजाड़ने , 
सर उठाकर खड़े पेड़ों को उखाड़ने , 
जो जीवन भर की मेहनत से बनते हैं, 
जो वर्षों में सर उठाकर खड़े होते हैं , 
इसीलिये हम रेत के महल नहीं बनाते , 
तिनकों से सपने नहीं बुनते, 
खुली आँखों से, 
जीवन की मुश्किलों को, 
संघर्षों से गूंथते हैं,


अरुण कान्त शुक्ला 
6/6/2017

Friday, May 26, 2017

खुशी

खुशी

जख्म परायों ने दिए, 
मैं मुस्कराता रहा, 
जख्म तुमने दिए, 
मैं हँस दिया,

बेवफाई के दौर से गुजरते हैं सभी, 
मैं भी गुजरा,
बेवफाई जब तुमने की,
मैं हंस दिया,

गुम्बद मीनार पर चढ़कर,
इतराने लगा,
तब नींव का पत्थर,
उसके गुरुर पर हंस दिया,


मुश्किलें बहुत आईं जिन्दगी में,
मुस्करा कर झेल गया,
पर, जब मुश्किल तुमने पैदा की,
नादानी पर तुम्हारी हंस दिया,

अरुण कान्त शुक्ला
26/5/2017      



Tuesday, April 4, 2017

तपिश

तपिश

ये तपिश
सिर्फ सूर्य की तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई घाम में आग घोल रहा है,

ये थकान
सिर्फ चलने की तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई पाँव में पत्थर बाँध कर चला रहा है,

ये दुश्मनी
सिर्फ मेरी तेरी तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई मेरे-तेरे बीच दुश्मनी करा रहा है,

मेरे आँगन के पत्थर
पहले भी गर्म होते थे
उन पर चलने से तलुए चिलकते थे,
पर अब गर्म कहाँ होते हैं जलाते हैं
यूँ लगता है
जैसे कोई उनमें आग लगा रहा है,

मेरे घर के झरोखे से
पहले भी गर्म हवाएं अन्दर आती थीं
पर, वो सुकून देती थीं,
अब तो लपटें आती हैं
हम डरते हैं झरोखे खोलने से
यूँ लगता है कोई झरोखे से अग्निबाण चला रहा है,

कौन है वो?

अरुण कान्त शुक्ला

4अप्रैल, 2017      

Tuesday, January 3, 2017

और कारवां...

और कारवां

न वाह वाह का शोर
न तालियों की गडगडाहट
न मित्रों की पीठ पीछे दी गईं गालियाँ
न भीड़ में पारित निंदा प्रस्ताव
कोई भी तो मुझे डिगा नहीं सका
मेरे चेहरे पर न एक दाग लगा सका
सबसे बेखबर बेपरवाह
आज भी मैं बढ़ रहा हूँ मंजिल-ऐ-ज़ानिब की ओर
कारवां के साथ
और कारवां
वह तो बनता गया
मंजिल की तरफ बढ़ते
मेरे हर कदम के साथ

9/2/2016  

सदियों बाद की पीढी भी ...

सदियों बाद की पीढ़ी भी

एक दिन होगा राज हमारा |2|
हिसाब तुम्हारा किया जाएगा |2|
छांट छांट कर |2|
छांट छांट कर एक एक गुनाह की,
सज़ा मुकर्रर की जायेगी|2|
जब होगी मौत तुम्हें|2|
जब होगी मौत तुम्हें धरती के,
इतने नीचे दफ़न किया जाएगा|2|
सदियों बाद की पीढ़ी को|2|
सदियों बाद की पीढ़ी को जब,
मिलेंगी हड्डियां तुम्हारी,
जब मिलेंगी हड्डियां तुम्हारी,   
वे भी गायेंगी उन्हें देखकर|2|
हर जुल्मी की|2|
हर युग में,
गत ऐसी ही की जाएगी|2|
सदियों बाद की पीढ़ी भी|2|
आज के विजय गीत गायेगी|2|
एक दिन होगा राज हमारा|2|
हिसाब तुम्हारा किया जाएगा|2|   

अरुण कान्त शुक्ला

1/1/2017