Wednesday, September 20, 2017

इस बरसात में


इस बरसात में

पहली बार बारिश हुई इस बरसात में
पहली बार भीगी सहर देखी इस बरसात में,

पहली बार सड़कें गीली देखीं इस बरसात में
पहली बार कीचड़ सने पाँव धोये आँगन में इस बरसात में,

पहली बार साँसों में सौंधी खुशबू गई इस बरसात में
पहली बार कच्छा-बनियान नहीं सूखीं इस बरसात में,

सूखी तो गुज़री हैं अनेकों बरसातें बरसात में
पहली बार खड़ी फसलें बर्बाद देखीं इस बरसात में,

उमस के मौसम तो देखे अनेकों बरसात में
पहली बार उमस को बरसते देखा इस बरसात में,

सावन की झड़ी और भादों की बारिश तो बिसरी यादें हैं
पहली बार जेठ की तपती दुपहरी देखी इस बरसात में,

काले काले बादलों को उमड़ते-गरजते-चमकते तो देखा हर बरसात में
‘गरजने वाले बरसते नहीं’ पहली बार सच होते देखा इस बरसात में,    

अरुण कान्त शुक्ला
20 सितम्बर, 2017   

   

Monday, August 28, 2017

तुम्हारी मन की बात पर

तुम्हारी मन की बात पर

प्रश्न सारे उठाकर रख दो ताक पर
जिसे जबाब देना है 
उसकी औकात नहीं जबाब देने की
पथ केवल एक ही शेष 
ठान लो मन में 
बाँध लो मुठ्ठियाँ
निकल पड़ो
ख़ाक में उसे मिलाने
जो चुप रहता है हर बवाल पर
उसकी कोई औकात नहीं   
प्रश्न उठाने की 
हमारे इस जबाब पर,

अच्छी नहीं हिंसा
आस्था के सवाल पर,
सुनते सुनते कान पाक गये
बहरे से कौन पूछेगा यह सवाल
फिर क्यों चुप रहते हो हर बवाल पर?
क्या पहचानते नहीं तुम
उन मवालियों को
जो फैलाते हैं हिंसा है सवाल पर?

न्यायालय फैसले करते हैं
सजा देते हैं या बरी कर देते हैं
यह सवाल
कभी सत्ता तंत्र से मुक्त न रहा
पर, मिटता नहीं वह दाग
जो लग जाता है माथे पर
एक बार तिलक बनकर
स्वयं को निहारो कभी खड़े होकर
दर्पण के सामने
तुम्हें दिख जायेंगे
हजारों मासूम चेहरे तुम्हारे पीछे  
करते ढेरो सवाल
तुम्हारी मन की बात पर,

अरुण कान्त शुक्ला
28/08/2017



   

        



Monday, August 14, 2017

फहराएंगे कल तिरंगा आराम से

फहराएंगे कल तिरंगा आराम से

हाकिम का नया क़ायदा है रहिये आराम से
गुनहगार अब पकडे जायेंगे नाम से,

हाकिम को पता है उसकी बेगुनाही,
वो तो सजावार है उसके नाम से,

उसका सर झुका रहा कायदों की किताब के सामने,
हाकिम को चिढ़ है उस किताब के नाम से,

जो जंग-ऐ- आजादी से बनाए रहे दूरियां,
फहराएंगे कल तिरंगा आराम से,

अरुण कान्त शुक्ला, 14 अगस्त 2017



Wednesday, June 7, 2017

तिनकों से बने सपने

तिनकों से बने सपने

तिनकों से बने सपने तो , 
हवा के हलके झोके से बिखर जाते हैं, 
आंधी तो आती है आशियाने उजाड़ने , 
सर उठाकर खड़े पेड़ों को उखाड़ने , 
जो जीवन भर की मेहनत से बनते हैं, 
जो वर्षों में सर उठाकर खड़े होते हैं , 
इसीलिये हम रेत के महल नहीं बनाते , 
तिनकों से सपने नहीं बुनते, 
खुली आँखों से, 
जीवन की मुश्किलों को, 
संघर्षों से गूंथते हैं,


अरुण कान्त शुक्ला 
6/6/2017

Friday, May 26, 2017

खुशी

खुशी

जख्म परायों ने दिए, 
मैं मुस्कराता रहा, 
जख्म तुमने दिए, 
मैं हँस दिया,

बेवफाई के दौर से गुजरते हैं सभी, 
मैं भी गुजरा,
बेवफाई जब तुमने की,
मैं हंस दिया,

गुम्बद मीनार पर चढ़कर,
इतराने लगा,
तब नींव का पत्थर,
उसके गुरुर पर हंस दिया,


मुश्किलें बहुत आईं जिन्दगी में,
मुस्करा कर झेल गया,
पर, जब मुश्किल तुमने पैदा की,
नादानी पर तुम्हारी हंस दिया,

अरुण कान्त शुक्ला
26/5/2017      



Tuesday, April 4, 2017

तपिश

तपिश

ये तपिश
सिर्फ सूर्य की तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई घाम में आग घोल रहा है,

ये थकान
सिर्फ चलने की तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई पाँव में पत्थर बाँध कर चला रहा है,

ये दुश्मनी
सिर्फ मेरी तेरी तो नहीं
इसमें कोई मिलावट है,
यूँ लगता है
जैसे कोई मेरे-तेरे बीच दुश्मनी करा रहा है,

मेरे आँगन के पत्थर
पहले भी गर्म होते थे
उन पर चलने से तलुए चिलकते थे,
पर अब गर्म कहाँ होते हैं जलाते हैं
यूँ लगता है
जैसे कोई उनमें आग लगा रहा है,

मेरे घर के झरोखे से
पहले भी गर्म हवाएं अन्दर आती थीं
पर, वो सुकून देती थीं,
अब तो लपटें आती हैं
हम डरते हैं झरोखे खोलने से
यूँ लगता है कोई झरोखे से अग्निबाण चला रहा है,

कौन है वो?

अरुण कान्त शुक्ला

4अप्रैल, 2017      

Tuesday, January 3, 2017

और कारवां...

और कारवां

न वाह वाह का शोर
न तालियों की गडगडाहट
न मित्रों की पीठ पीछे दी गईं गालियाँ
न भीड़ में पारित निंदा प्रस्ताव
कोई भी तो मुझे डिगा नहीं सका
मेरे चेहरे पर न एक दाग लगा सका
सबसे बेखबर बेपरवाह
आज भी मैं बढ़ रहा हूँ मंजिल-ऐ-ज़ानिब की ओर
कारवां के साथ
और कारवां
वह तो बनता गया
मंजिल की तरफ बढ़ते
मेरे हर कदम के साथ

9/2/2016  

सदियों बाद की पीढी भी ...

सदियों बाद की पीढ़ी भी

एक दिन होगा राज हमारा |2|
हिसाब तुम्हारा किया जाएगा |2|
छांट छांट कर |2|
छांट छांट कर एक एक गुनाह की,
सज़ा मुकर्रर की जायेगी|2|
जब होगी मौत तुम्हें|2|
जब होगी मौत तुम्हें धरती के,
इतने नीचे दफ़न किया जाएगा|2|
सदियों बाद की पीढ़ी को|2|
सदियों बाद की पीढ़ी को जब,
मिलेंगी हड्डियां तुम्हारी,
जब मिलेंगी हड्डियां तुम्हारी,   
वे भी गायेंगी उन्हें देखकर|2|
हर जुल्मी की|2|
हर युग में,
गत ऐसी ही की जाएगी|2|
सदियों बाद की पीढ़ी भी|2|
आज के विजय गीत गायेगी|2|
एक दिन होगा राज हमारा|2|
हिसाब तुम्हारा किया जाएगा|2|   

अरुण कान्त शुक्ला

1/1/2017