Saturday, November 11, 2017

नाव में पतवार नहीं

नाव में पतवार नहीं

हुजूर, आप जहां रहते हैं,
दिल कहते हैं,
उसे ठिकाना नहीं,

शीशे का घर है
संभलकर रहियेगा, हुजूर
टूटेगा तो जुड़ेगा नहीं,

यादों की दीवारे हैं
इश्क का जोड़
बेवफाई इसे सहन नहीं,

ओ, साजिशें रचने वालो
घर तुम्हारा है
क्या इसका एतबार नहीं?

अपना रास्ता खुद बनाया
मोहताज न रहा
सरपरस्ती मेरी पसंद नहीं,

वायदों पे एतबार न करना
झूठे होते हैं
करने वाले कहते नहीं,

मकां छोड़कर न जाना
भले लोग अब
आसानी से मिलते नहीं,

ओ, एतबार करने वालो
आँखें तो खोलो
नाव में पतवार नहीं,

उसे देना था मुश्किलें
वो देता रहा
मुस्कराहटों में आई कमी नहीं,


अरुण कान्त शुक्ला, 9/11/2017     

    

ये आलिमां भी बहायेंगे आब-ऐ-तल्ख़

ये आलिमां भी बहायेंगे आब-ए-तल्ख़
कैसे कैसों को दिया है,
इंसान होकर सांप से डसते रहे,
उन्हें भी दिया है,
इस बार क्यों न सांप से ही डसवा लें,
दूध की जगह खून पिलवा दें,
दो गज जमीन के नीचे,
2×3
के गढढे में,
इंसानियत को दफना दें,

ये तय जानकर,
खून के दरिया को हमें पार न करना होगा,
बाकी कायनात को,
खूरेंज को इनायत फरमा दें,
जिन्दगी भर जिन असूलों के लिए लड़े,
क्यूं कर उनसे मुंह फेर लें,
क्यूं इतने खुदगर्ज हो जायें,
बिना दरवाजे के घर में कैद हो जायें,
कि बाकी दुनिया दरिन्दे को दिला दें हम,

पुराने जख्म अभी भरे भी न थे,
यादें ताजा थीं,
जनाजे उठाने की बात तो दूर,
घरों में लोग रोने को भी न बचे थे,
कि, तुमने फिर,
मुज्जफरनगर में खून का दरिया बहा दिया,
84 कोस की परिक्रमा न हो सकी तो,
84 कोस तक लाशों का बिस्तर सजा दिया,

ये अज़ाब हर दौर में इंसा झेलते आया है,
अदीबों का पाला बदलना नई बात नहीं,
आब-ए-चश्म जिनके सूख चुके,
तुम्हारे आफ़ात को जो भुला चुके,
अदीबों की फ़ौज आज फिर खड़ी है,
खूंरेंजों के साथ,
ये आलिमां भी बहायेंगे आब-ए-तल्ख़,
जब इंसानियत पर बरसेंगे आफ़ात,

क़ातिल को दे दें रहनुमाईं,
और कैद हो जायें हम,
आदमियत को डाल दें कफ़स में,
ऐसा कैसे हो जाने दें हम,
आगे तुम्हें दिखे है तारीक,
पर, खुर्शीद ऊगता है ज़ाबिता,
इस काईदे पर कैसे भरोसा खोयें हम,

अरुण कान्त शुक्ला,
1अक्टोबर, 2013


Tuesday, November 7, 2017

पूनम की रात को भी चाँद गायब हो गया


अमावस की रात को चाँद का गायब होना
कोई नई बात नहीं
जहरीली हवाओं की धुंध इतनी छाई
पूनम की रात को भी चाँद गायब हो गया|

दिल में सभी के मोहब्बत रहती है
कोई नई बात नहीं
हमने मोहब्बत इंसानियत से की
ये गजब हो गया|

कहते हैं दर्द बयां करने से कम होता है
हमने बयां किया
दर्द तो कम न हुआ
लोग कहने लगे, मैं शायर हो गया|

इश्क-रश्क-माशूक की मोहताज नहीं
शायरी वो ज़ज्बा है अरुण
मशाल भी है, इंक़लाब भी है,
जिसे लगी 'चाहत' वतन की, सरफरोश हो गया |

अरुण कान्त शुक्ला, 8/1/2017 

Sunday, November 5, 2017

जिन्दगी का शायर हूँ ..

जिन्दगी का शायर हूँ

जिन्दगी का शायर हूँ, मौत से क्या मतलब
मौत की मर्जी है, आज आये, कल आये|

टूट रहे हैं, सारे फैलाए भरम ‘हाकिम’ के,
हाकिम’ को चाहे यह बात, समझ आये न आये|

वो ‘इंसा’ गजब वाचाल निकला
बात उसकी, किसी को समझ आये न आये|

‘आधार’ जरुरी है ‘जीवन’ के लिये
‘आधार’ बिना रोटी नहीं, इंसा जी पाये न जी पाये

गाफिल रहे, जिन्दगी खुशनुमा बनाने रदीफ़-काफिये मिलाते रहे
जिन्दगी की ‘गजल’ लय-ताल से नहीं चलती, समझ न पाये

अरुण कान्त शुक्ला, 6/11/2017    


Friday, November 3, 2017

लोग सुनकर क्यूं मुस्कराने हैं लगे

लोग सुनकर क्यूं मुस्कराने हैं लगे

और भी खबसूरत अंदाज हैं मरने के लेकिन
इश्क में जीना 'अरुण' को सुहाना है लगे 

क्यूं करें इश्क में मरने की बात
इश्क तो जीने का खूबसूरत अंदाज है लगे 

दिल में आई है बहार जबसे 
पतझड़ को आने से डर है लगे 

हमें क्या मालूम महबूब का पता 
दिल ही उसका अब घर है लगे 

नजरें चुराईं, नजरें झुकाईं, लाख जतन किये   
मिलीं नजरें तो हटाने का मन न करे 

इश्क को लाख छुपाया, छुपा न सके
जो हम उड़े उड़े से वो खोये खोये रहने हैं लगे

एक गम होता तो बता देते सबको 
उनसे मिलना छोड़ अब सब ग़मगीन है लगे

फ़िजाओं में खुशबू सी फ़ैली है बात
फ़साने हमारे लोग हमें ही सुनाने हैं लगे

नया है, नहीं पुराना अपना फ़साना 
सुनकर आप क्यूं मुस्कराने हैं लगे  

जमाने ने दिए गम बहुत पर तुम्हें नहीं भूले हम 
जताने ये तराने इश्क के गाने हैं लगे


अरुण कान्त शुक्ला, 4/11/20 

Thursday, October 12, 2017

ईश्वर भी अब मालिक हो गया है

ईश्वर भी अब मालिक हो गया है  

पत्थर के देवता अब जमाने को रास नहीं आते
संगमरमर के गढ़े भगवान हैं अब पूजे जाते,

ईश्वर किसी मालिक से कम नहीं   
मुश्किल है उसका मिलना रास्ते में आते जाते,

भक्त को नहीं जरूरत कभी मंदिर जाने की
भगवान उसके तो उसके साथ ही हैं उठते, बैठते, खाते,

मंदिर के भगवान से बेहतर तो राह के पत्थर हैं
राही को ठोकर मारकर हैं चेताते,

राह के पत्थरों को ध्यान से देखते चलना
राह भूलने पर ये ही हैं रास्ता बताते,

जाने कैसे लोग हैं वो जिनके दिल पत्थर के हैं
हम तो दिल पर पत्थर रखकर जीवन हैं बिताते,


अरुण कान्त शुक्ला, 12/10/2017     

Sunday, October 8, 2017

लोकतंत्र में

लोकतंत्र में

संघर्ष
और संघर्ष
प्रत्येक संघर्ष का लक्ष्य विजय
विजय का अर्थ
दो वक्त की रोटी/ दो कपड़े /सर पर छत
अभावहीन जीवन जीने की चाहत
बनी रहेगी जब तक
विजय का अर्थ
जारी रहेगा संघर्ष तब तक
संघर्ष निरंतर है
संघर्ष नियति है
लोकतंत्र में| 

क्लेश
और क्लेश
उत्सवधर्मी देश में
क्लेश/संताप/विहलता से ही संघर्षरत रहना
बना रहेगा जब तक जीवन का अर्थ
आते रहेंगे दिवाली/ईद/क्रिसमस/होली
माथे पर शिकनें लिए
जो खोती रहेंगी बाजार में
जो है आज का परम सत्य
क्लेश/संताप/विहलता से दूर
अपने में मस्त
लोकतंत्र में|

स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा
लोकतंत्र का नारा
खो चुका अपना अर्थ
लोकतंत्र बन गया है दास
स्वामी बन गए हैं उसके समर्थ
वंचितों और उत्पीड़ितों के सीने पर
नृत्य कर रहे समर्थ
जब तक प्राप्त नहीं कर लेता  
लोकतंत्र अपना खोया नारा और  
बनी रहेगी आमजनों में जब तक
स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की अभिलाषा
जारी रहेगा वंचितों का संघर्ष
अनवरत
लोकतंत्र में|

15 अगस्त
26 जनवरी
बने हैं सरकारी समारोह
भुला दिए गए सन्दर्भों के उत्सव
मनाये जाते हैं ‘लोक’ से दूर
‘लोक’ जंजीरों में जकड़ा
पड़ा है समारोहों से दूर
काट नहीं लेगा जब तक अपनी जंजीरें
‘लोक’ रहेगा संघर्षरत
इन जंजीरों के खिलाफ
लोकतंत्र में|

अरुण कान्त शुक्ला, 8/10/2017